भवानीपुर का राजनीतिक इतिहास: कांग्रेस से TMC तक ममता बनर्जी का गढ़ बना क्यों

पश्चिम बंगाल की राजनीति में भवानीपुर विधानसभा सीट का इतिहास अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इस सीट की राजनीतिक यात्रा राज्य की पूरी राजनीतिक तस्वीर को दर्शाती है—कांग्रेस के प्रभुत्व के दौर से लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उदय तक। वर्तमान में इसे ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं था। भवानीपुर का चुनावी इतिहास यह दिखाता है कि कैसे राज्य की राजनीति ने दशकों में कई बदलाव देखे।
ममता बनर्जी की भवानीपुर पर दृष्टि
तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में पार्टी की बैठक में नेताओं को सतर्क रहने की सलाह दी। ममता ने कहा कि स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर है और सिर्फ तीन दिनों में 50 लोगों को पदों से हटा दिया गया। उन्होंने कई पार्षदों के आचरण और प्रदर्शन पर असंतोष व्यक्त किया। भवानीपुर को लेकर ममता ने कहा, “भवानीपुर में हर कोई मुझे जानता है। घर बदलने की चर्चा के बावजूद मैं कभी यहां से नहीं गई। मेरी मां ने मुझे इस घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी।” यह बयान उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक जुड़ाव को दर्शाता है।

भवानीपुर विधानसभा सीट का इतिहास
PTI की जानकारी के अनुसार, देश की स्वतंत्रता के बाद दक्षिण कोलकाता की यह सीट लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ रही। पूर्व मुख्यमंत्री सिदार्थ शंकर राय ने इस सीट से चुनाव जीतकर कांग्रेस और बाद में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा मीरा दत्ता गुप्ता और रठिन तालुकदार जैसे अन्य कांग्रेस नेता भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। भवानीपुर की राजनीति में कांग्रेस का प्रभुत्व कई दशकों तक रहा। 1969 में इस क्षेत्र का नाम बदलकर कालिघाट कर दिया गया और उस समय वाम मोर्चा ने इसे अस्थायी रूप से अपने कब्जे में लिया। 1953 में CPI(M) नेता साधन गुप्ता इसी सीट से भारत के पहले दृष्टिहीन सांसद बने।
सीट का पुनर्जन्म और TMC का उदय
1972 में, एक परिसीमन प्रक्रिया के बाद, भवानीपुर विधानसभा सीट चुनावी नक्शे से गायब हो गई। लगभग चार दशकों तक यह केवल राजनीतिक स्मृति में रही। 2011 के परिसीमन के दौरान यह सीट पुनर्जीवित हुई। यही वह वर्ष था जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव आया—वाम मोर्चा का 34 साल का शासन समाप्त हुआ और ममता बनर्जी का युग शुरू हुआ। इस पुनःस्थापना के बाद भवानीपुर न केवल TMC का गढ़ बना बल्कि ममता बनर्जी की व्यक्तिगत और राजनीतिक पहचान का भी प्रतीक बन गया।